हिन्दू धर्मशास्त्रों में दस्यु, दास और शूद्र की स्थिति

Status of dasyu, dasa and shudra in Hindu theology

आर्यों के प्रथम ग्रंथ ऋग्वेद में ‘आर्य’ और ‘दस्यु’ उसी तरह स्थान-स्थान पर प्रयुक्त हुए है, जैसे कालान्तर में ‘सभ्य’ और ‘असभ्य’, ‘सज्जन’ और ‘दुर्जन’ शब्दों का परस्पर विपरीत अर्थ में प्रयोग हुआ |

दस्यु शब्द की उत्पत्ति संदेहात्मक है और ऋग्वेद में अनेक स्थलों पर मानवेतर शत्रु के नाम से इसका वर्णन हुआ है | दूसरे स्थलों से दस्यु से मानवीय शत्रु, सम्भवतः आदिम स्थिति में रहने वाली असभ्य जातियों का बोध होता है |Status of dasyu, dasa and shudra in Hindu theology

आर्य और दस्यु का सबसे प्रमुख अंतर उनके धर्म में है | हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार दस्यु यज्ञ न करने वाले, क्रियाहीन, देवों से घृणा करने वाले आदि होते थें |

दस्यु और दासों अलग थें | ऋग्वेद में आर्यों के देवता इन्द्र को ‘दस्युह्त्य’ प्रायः कहा गया है, इसके विपरीत दासों की हत्या के अलग-अलग प्रसंग भी आये है लेकिन इन्द्र के लिए ‘दासह्त्य’ शब्द का प्रयोग कही नही किया गया है |

आर्य दस्युओं की हत्या तो निर्ममतापूर्वक करते थें लेकिन दासों के प्रति उनका रवैया नरम था |

ऋग्वेद (4|28|4) में इन्द्र के बारे में यह वर्णन है कि उसने दस्युओं को सभी अच्छे गुणों से वंचित रखा है और दासों को अपने वश में किया है |  इसी ग्रंथ (3|34|9) ) में इन्द्र की इस बात पर प्रशंसा की गयी है कि उसने दस्युओं की हत्या करके आर्य वर्ण की रक्षा की है |

दस्यु एक जाति थी जिसका बोध उनके विरुद ‘अनास’ से होता है | अनास का अर्थ कई निकाले जाते है | वेदों के सर्वमान्य भाष्यकर्ता सायण के अनुसार अनास का अर्थ (अन = आस) ‘मुखरहित’ है |

जबकि कुछ विद्वान् अनास का अर्थ (अ = नास) ‘नासिकारहित’ लगाते है, जिसका अर्थ सानुनासिक ध्वनियों के उच्चारण करने में असमर्थ हो सकता है | यही यह ‘अनास’ का ठीक अर्थ है तो दस्युओं का अन्य विरुद ‘मृध्नवाच्’ है, जोकि ‘अनास’ के साथ आता है, जिसका अर्थ ‘तुतलाने वाला’ होता है |

दस्यु का ईरानी भाषा में समानार्थक ‘पन्दु’, ‘दक्यु’ है, जिसका अर्थ एक प्रान्त है | जिमर इसका प्रारम्भिक अर्थ ‘शत्रु’ लगाते है, जबकि पारसी लोग इसका अर्थ ‘शत्रुदेश’, ‘विजित देश’, ‘प्रान्त’ लगाते है |

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद की एक शाखा) में दस्यु से असभ्य जातियों का बोध होता है | ऋग्वेद से स्पष्ट होता है कि दासों और दस्युओं के पास अनेक किलाबंद बस्तियां थी | खानाबदोश आयों की नजर अपने इन शत्रुओं की किलेबंद बस्तियों में संचित सम्पत्ति पर लगी रहती थी और इसे हड़पने के लिए आर्य इनपर आक्रमण करते रहते थें |

आर्य दस्युओं पर आरोप लगाते है कि दस्यु सम्पत्तिशाली (धनिनः) होने पर भी यज्ञ न करने वाले (अक्रतु) है | ऋग्वेद (176|4) में ईश्वर से प्रार्थना की गयी है कि समस्त ऐसे व्यक्तियों की हत्या कर दी जाये जो यज्ञ हवन आदि नही करते थें | साथ ही इनकी हत्या करके इनकी समस्त सम्पत्ति आर्यों में बाँट दी जाये |

ऋग्वेद (3|53|14) में यह भी वर्णन है कि ‘कीकट’ (हरियाणा में निवास करने वाली एक जनजाति) गाय रखने के अधिकारी नही है, क्योकि वें यज्ञ में गव्य (दूध से निर्मित वस्तुओं) का प्रयोग नही करते है |

अथर्ववेद (2|14|5) में दस्युओं का भूत-पिशाच के रूप में वर्णन किया गया है और उन्हें यज्ञ स्थल से भगाने का प्रयास किया गया है | इसमे (12|1|37) यह भी कहा गया है कि ईश्वर के निंदक दस्युओं को बलिवेदी पर चढ़ा देना चाहिए |

ऋग्वेद (7|5|2-3) में यह वर्णन भी आया है कि आर्य कभी-कभी काले रंग वाले मनुष्यों (दस्युओं) की बस्तियों में आग लगा देते थें और वें लोग बिना संघर्ष किये ही अपना सबकुछ छोडकर भाग जाते थें |

ऋग्वेद (4|16|13) में एक स्थान पर इन्द्र को पचास हजार काले वर्णवालों की हत्या का श्रेय दिया गया है | इन्द्र का असुरों असुरों की काली चमड़ी उधेड़ने का भी चित्रण हुआ है |

प्रसिद्ध इतिहासकार आर.एस. शर्मा ‘शूद्रों का प्राचीन इतिहास’ में लिखते है कि, “इन्द्र का एक वीरतापूर्ण कार्य, जिसका कुछ ऐतिहासिक आधार हो सकता है, कृष्ण नामक योद्धा के साथ उसका युद्ध है | कहा जाता है कि जब कृष्ण ने अपनी दस हजार सेना के साथ अंशुमति या यमुना पर खेमा गिराया तब इन्द्र ने मरुतों (आर्यविश) को संगठित किया और पुरोहित देव वृहस्पति की सहायता से अदेवीः विशः के साथ युद्ध किया | अदेवीः विशः का अर्थ सायण ने काले रंग का असुर बताया है (कृष्णरूपाः असुरसेनाः) | कृष्ण को श्याम वर्ण का आर्येतर योद्धा बताया गया है जो यादव जाति का था | यह संभव मालूम पड़ता है, क्योकि परवर्ती अनुश्रुति है कि इन्द्र और कृष्ण में बड़ी शत्रुता थी | ऐसा प्रसंग आया है जिसमे कृष्णगर्भा के मारे जाने की चर्चा है, जिसका अर्थ संशयपूर्वक सायण ने कृष्ण नामक असुर की गर्भवती पत्नियाँ बताया है |”

ऋग्वेद में दस्युओं की तरह ‘दासों’ को भी देवों का शत्रु कहा गया है | दास पुरों (दुर्गों) के अधिकारी कहे गये है और इनके विशों (गणों) का वर्णन है | ऋग्वेद में इन्द्र से प्रार्थना की गयी है कि वह दासों की शक्ति क्षीण करें और इनकी सम्पत्ति लोगों में बाँट दें |

ऋग्वेद में आर्य शब्द का उल्लेख छत्तीसबार हुआ है, दस्युगण शब्द का उल्लेख चौरासी बार हुई है जबकि दास शब्द का उल्लेख इकसठ बार हुआ है |

ऋग्वेद में काले ऋषियों की भी चर्चा मिलती है | ऋग्वेद (1|117-8) में अश्वनी के सम्बन्ध में वर्णन किया गया है कि उन्होंने काले वर्ण के कण्व को गौरवर्ण की स्त्रियाँ प्रदान की थी | इतिहासकार रामशरण शर्मा के अनुसार शायद कण्व को ही पुनः ऋग्वेद के प्रथम मंडल में कृष्ण ऋषि के रूप में चित्रित किया गया है |

ऋग्वेद के प्रथम मंडल में ऋषि दिवोदास को नई ऋचाओं का रचयिता बताया गया है | ऋषि दिवोदास के नाम से ही ध्वनित होता है कि वे दास थें |

ऋग्वेद में दसियों का भी थोडा वर्णन मिलता है | दासी शब्द के प्रयोग से स्पष्ट होता है कि वे पराजित दासों की स्त्रियाँ रही होंगी | सम्भवतः आर्य अपने शत्रुओं को मारकर उनकी पत्नियों को दासी बना लेते थें | अथर्ववेद (5|13|8) में काली दासी का प्राचीनतम वर्णन मिलता है |

ऋग्वेद के बालखिल्य सूक्त में सौ दासों का वर्णन किया गया है, जिन्हें गदहे व भेड़ की कोटि में रखा गया है |

वैदिक काल के बाद दासों की स्थिति और भी खराब होती गयी | कई बार अत्याचार से तंग आकर दास अपने स्वामी की कैद से भाग जाते थें | विनय पिटक में यह उल्लेख मिलता है कि कुछ दासों ने भागकर बौद्ध मठ में शरण की थी |

हमे कही-कही यह भी पता चलता है कि दासों को जंजीरों बांधकर भी रखा जाता था, जिससे वें भाग न जायें |

जातक में यह बताया गया है कि बलि के लिए रखे गये कुछ व्यक्तियों ने अपनी जान बचाने के लिए अत्याचारी पुरोहित को कहा कि वे जंजीर में जकड़े रहकर भी उसका दास बनकर सेवा करने को तैयार है |   

दस्यु और दास के अतिरिक्त शूद्रों वर्ण का भी ऋग्वेद में वर्णन मिलता है | चार वर्ण की उत्पत्ति का सबसे पहला उल्लेख ऋग्वेद के दसवें मंडल के पुरुषसूक्त में मिलता है, जिसकी पुनरावृत्ति अथर्ववेद के उन्नीसवें भाग में हुई |

इसमे वर्णन है कि ब्राह्मण की उत्पत्ति आदिमानव (ब्रह्मा) के मुँह से, क्षत्रिय की उसकी भुजाओं से, वैश्य की उसकी जांघों से तथा शूद्रों की उत्पत्ति उसके पैरों से हुई थी | इससे यह स्वीकार किया जा सकता है कि चारो वर्ण का सम्बन्ध एक ही वंश से था |

शूद्रों की उत्पत्ति पैरों से होने की इस कहानी का अर्थ यह भी हो सकता है कि समाज में शूद्रों की गुलामों जैसी स्थिति को न्यायसिद्ध बताया जा सकें | “और 1500-1000 ई.पू. की यह कहानी इतनी सफल रही कि 21 सदी में भी अधिकांश दलित खुद को अन्य तीनों वर्णों से तुच्छ मानने में अपमान महसूस नही करते हैं |”

अतः एक शूद्र भले ही उसके पास बहुत से पशु हो, यज्ञ करने के योग्य नही है, वह देव-हीन है, उसके लिए किसी देवता की रचना नही की गयी, क्योकि उसकी उत्पत्ति पैरों से हुई |” 

शूद्रों की उत्पत्ति के बाद जो संघर्ष आर्यों और दासों या दस्युओं में मध्य होता था, अब वह परिवर्तित होकर आर्यों और शूद्रों के बीच होने लगा |

ऋग्वेद में आर्यों को काले चर्म वाले लोगों से अलग बताया गया है | धर्मसूत्रों (आपस्तंब धर्मसूत्र 1|9|27|11, बौधायन धर्मसूत्र 2|1|59) में शूद्रों को काले वर्ण का कहा गया है |

वैदिक काल के अंतिम समय में शूद्रों को अछूत का दर्जा मिलने लगा था और मांगलिक अवसरों पर उनकी उपस्तिथि व उनके शरीर के स्पर्श, दर्शन आदि का निषेध माना जाने लगा | शूद्रों के शरीर से स्पर्श होना तथा कुछ विशेष अवसरों पर तो शूद्रों को देखने पर भी मनाही की जाने लगी | शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख मिलता है कि यज्ञ के लिए अर्पित व्यक्ति को शूद्रों से बोलने की भी अनुमति नही है |

शतपथ ब्राह्मण में यह भी कहा गया है कि प्रवर्ग्य समारोह में याजक को शूद्रों और स्त्री से सम्पर्क नही करना चाहिए क्योकि वे असत्य हैं |

उत्तर वैदिक काल तक शूद्रों के प्रति तिरस्कार की दृष्टि इतनी प्रबल हो गयी थी कि मृत्यु के बाद भी उनकी पहचान समाप्त नही की जाती थी | यह निर्धारित किया गया था कि शूद्रों के लिए जो समाधिटीला बनाया जायेगा वो घुटने-भर ही ऊँचा हो सकता है |

समाधिटीले की ऊंचाई में व्यक्ति के वर्ण के अनुसार अंतर किया जाता था | शतपथ ब्राह्मण से पता चलता है क्षत्रियों की समाधि सबसे ऊंची होती थी और उसके बाद ब्राह्मणों की |

वैदिक काल के बाद शूद्रों की स्थिति अत्यधिक खराब हो गयी | धर्मसूत्रों (आपस्तंब धर्मसूत्र, गौतम धर्मसूत्र) ने स्पष्ट रूप से आदेश दिया कि शूद्रों को तीन उच्च वर्णों की सेवा करके अपने आश्रितों का भरण-पोषण करना चाहिए |

यह विचार सर्वप्रथम धर्मसूत्रों में ही मिलता है कि अगर किसी भोजन को शूद्र ने छू लिया है, तो उसे ब्राह्मण ग्रहण नही कर सकता, क्योकि वह भोजन अपवित्र हो गया |

आपस्तंब धर्मसूत्र (1|5|17|1) में यह बताया गया है कि यदि भोजन करते समय किसी ब्राह्मण को कोई शूद्र छू ले तो उसे वह भोजन नही करना चाहिए, क्योकि शूद्र-स्पर्श से वह अपवित्र हो जाता है |

लेकिन आपस्तंब धर्मसूत्र (1|6|18|15) ने ब्राह्मणों को इतनी छूट तो दी है कि नितांत अभावग्रस्तता की स्थिति में वह शूद्र का अन्न ग्रहण कर सकता है, लेकिन शर्त यह है कि वह अन्न स्वर्ण तथा अग्नि को स्पर्श कराकर पवित्र कर लिया जाये और जैसे ही उस ब्राह्मण को कोई वैकल्पिक जीविका प्राप्त हो जाये, वैसे ही वह शूद्र का अन्न ग्रहण करना त्याग दे | 

गौतम धर्मसूत्र (10|58) में कहा गया है कि शूद्र नौकर को चाहिए कि वह उच्च वर्ण के व्यक्तियों द्वारा उतार फेंके गए जूते, वस्त्र, छाते व चटाई का प्रयोग करे |

शूद्र नौकर को अपने मालिकों के जूठन पर आश्रित रहना पड़ता था | गौतम धर्मसूत्र (10|59) में उल्लेख आया है कि भोजन का जूठन शूद्र नौकरों के लिए रखा जाता था | आपस्तंब धर्मसूत्र (1|1|3|40) में छात्रों को यह आदेश दिया गया है कि उनकी थाली में जो जूठन रह जाए उसे अपने गुरु के शूद्र नौकर के निकट रख दें |

अगर शूद्र सम्पन्न भी होता है तो भी धर्मशास्त्र उसे द्विजों से हीन ही मानते है | ताण्ड्यमहाब्राह्मण (6|1|11) के अनुसार “अतः एक शूद्र भले ही उसके पास बहुत से पशु हो, यज्ञ करने के योग्य नही है, वह देव-हीन है, उसके लिए किसी देवता की रचना नही की गयी, क्योकि उसकी उत्पत्ति पैरों से हुई |” 

उच्च वर्ण के लोगों को शूद्र वर्ण से धन छीनने का भी अधिकार धर्मशास्त्रों ने दे दिया था | गौतम धर्मसूत्र कहना है कि कोई व्यक्ति अपनी कन्या के विवाह का खर्च वहन करने के लिए और किसी धार्मिक अनुष्ठान के लिए शूद्र से छल अथवा बल द्वारा धन ले सकता है |

उत्तराधिकार-विधि में शूद्र पत्नी से उत्पन्न पुत्र के हिस्से के बारे में भेदभावपूर्ण प्रावधान किए गये हैं | वासिष्ठ धर्मसूत्र ने विभिन्न वर्णों की पत्नियों से पुत्र रहने पर मात्र तीन उच्चवर्णों के पुत्रों को हिस्सा देने की व्यवस्था की है, और शूद्र पुत्र को नजरअंदाज किया है |

लेकिन ब्राह्मण पुरुष और शूद्र स्त्री के विवाह पर धर्मसूत्र सहमति नही देते है | वशिष्ठ धर्मसूत्र का कहना है कि शूद्र पत्नी को सुख-सम्भोग के लिए रखा जा सकता है, लेकिन उससे विवाह नही किया जा सकता है |

आपस्तंब और बौधायन धर्मसूत्र में ऐसे व्यक्तियों के लिए शुद्धिकरण संस्कार दिए गये है, जिन्होंने शूद्र स्त्री से सम्भोग किया है |  

आपस्तंब और गौतम धर्मसूत्रों ने आदेश दिया है कि अगर बातचीत करने में या सड़क पर चलने पर या बैठने, लेटने पर शूद्र किसी द्विज (ब्राह्मण और क्षत्रिय) की बराबरी करे तो उस शूद्र को कोड़े से पीटना चाहिए |

धर्मशास्त्रों में शूद्रों की जान को किसी पशु या पक्षी की जान के बराबर ही महत्व दिया गया है | आपस्तंब (1|9|25|13) और बौधायन (1|10|19|6) धर्मसूत्रों में शूद्र की हत्या करने पर वही प्रायश्चित निर्धारित किये गये है जो किसी राजहंस, मोर, कौवे, उल्लू, कुत्ते, मेढ़क, छछूंदर आदि की हत्या के लिए |

धर्मसूत्रों ने वर्ण के अनुसार अभिवादन के स्वरुप में निर्धारित किये है | आपस्तंब धर्मसूत्र में कहा गया है कि ब्राह्मण को अपनी दाहिनी बाँह को अपने कान के समानांतर, क्षत्रिय उसे अपनी छाती तक, वैश्य अपनी कमर तक तथा शूद्र उसे अपने पाँव की सीध में रखकर अभिवादन करना चाहिए |

धर्मसूत्रों में शूद्र के लिए वेदों का अध्ययन निषेध था, जिसके कारण उन्हें यज्ञों व धार्मिक कार्यों से भी दूर रखा जाता था क्योकि इनमे वैदिक मन्त्रों का प्रयोग किया जाता था |

तैत्तिरीय संहिता (7|1|1|6) के अनुसार जैसे पशुओं में घोड़ा होता है, वैसे मनुष्यों में शूद्र है, अतः शूद्र यज्ञ के योग्य नही है |

गौतम धर्मसूत्र में बताया गया है कि यदि कोई शूद्र वेद की ऋचाओं का पाठ करे तो उसकी जीभ काट देनी चाहिए और यदि वह उन ऋचाओं को स्मरण रखे तो उसके शरीर के दो टुकडें के देना चाहिए |

पारस्कर गृह्यसूत्र से पता चलता है कि वैदिक यज्ञ से शूद्रों का बहिष्कार इस सीमा तक कर दिया गया था कि कुछ धार्मिक कार्यों में तो उसका उपस्थित होना और देखना भी निषेध था |

ऐतरेय ब्राह्मण (35|3) के अनुसार शूद्र दूसरों से अनुशासित होता है, वह किसी की आज्ञा पर उठता है, उसे कभी भी पीटा जा सकता है |

गौतम धर्मसूत्र यह आज्ञा देता है कि गैर ब्राह्मण जाति को ब्राह्मण का अतिथि नही होना चाहिए | आपस्तंब (2|2|4|19) और बौधायन (2|3|5|14) धर्मसूत्रों का कहना है कि यदि कोई शूद्र अतिथि के रूप में ब्राह्मण के घर आये तो उससे भोजन के पहले कुछ कार्य कराया जाये और जब वह कार्य पूर्ण हो जाये तब उस शूद्र को भोजन देना चाहिए |

आपस्तंब धर्मसूत्र (2|2|4|20) में यह भी कहा गया है कि ब्राह्मण न तो उस शूद्र अतिथि का सत्कार करे और न ही स्वयं खाना खिलाये, बल्कि ब्राह्मण का नौकर राजा के भंडार से चावल लाकर उसे भोजन कराए | आपस्तंब का यह भी कहना है कि ब्राह्मणों के लिए राजा के भंडार में इस प्रयोजन की सामग्री रखी जाएगी |

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